Guru Teg Bahdur Dohe

सुख दुख जिह परसै नहीं, लोभ मोह अभिमान।
कहु नानक सुन रे मना, सो मूरत भगवान॥

उसतुति निंदा नाहिं जिहि, कंचन लोह समान।
कहु नानक सुन रे मना, मुकत ताहि तैं जानि॥

हरख-सोग जाके नहीं, बैरी मीत समान।
कहु नानक सुन रे मना, मुकत ताहिं तैं जानि॥

भै का कउ देत नहिं, नहिं भै मानत आनि।
कहु नानक सुन रे मना, गिआनी ताहि बखानि॥

मन माइआ में रमि रहिओ, निकसत नाहिन मीत।
नानक मूरति चित्र जिउ, छाडत नाहिन भीत॥

राम गइओ रावन गइओ, जाको बहु परिवार।
कहु नानक थिरु कुछ नहीं, सुपने जिऊँ संसार॥

चिंता ताकि कीजिए, जो अनहोनी होई।
इह मारगु संसार को, नानक थिरु नहिं कोइ।

 

These are dhoe written by Shri Guru Teg bahadur Ji. In these Dohe he describes the characteristic, of a devotee. In the first doha

Guru Ji explains , a person who take pleasure and sorrow at the same level , and is not attached, does not have greed and does not have pride. He is the person who has realized God.

 

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