हिन्दू संस्कृति की एक विशेषता

हिन्दू संस्कृति में एक विशेषता है कि पहले संकल्प करो, फिर कार्य करो | हिन्दू संस्कृति और परंपरा में संकल्प के बिना कोई काम नहीं होता है | भगवान रामचंद्र ने राजा की प्रतिज्ञा का अर्थ जीवन में उतार कर दिखाया | उन्होंने कहा –  स्नेहं दयां च सौख्यं च, यदि वा जानकीमपि | आराधनाय लोकानां, मुंचतो नास्ति में व्यथा | अर्थात – समाज की आराधना के लिए यदि स्नेह, दया, सुख यहाँ तक कि जानकी का भी त्याग करना पड़े तो मुझे कोई पीड़ा नहीं है |  संघ के निर्माता भी ऐसे ही महापुरूषों में से एक थे | उन्होंने अपनी साधना के द्वारा आचरण का आदर्श प्रस्तुत किया, एक मार्ग बनाया | संघ – निर्माता द्वारा निर्मित मार्ग को अधिकाधिक विशाल और बृहत बनाने के लिए ही संघ में प्रतिज्ञा की विधि है | एक बार प्रतिज्ञा की तो फिर रुके नहीं | जो – जो संघ का सदस्य बनना चाहता है, उसे प्रतिज्ञा करनी पड़ेगी | यह क्रम तब तक चलता रहेगा, जब तक 100 करोड़ लोग प्रतिज्ञा नहीं करते | मुट्ठी भर लोग काम करेंगे या बलिदान करेंगे, उससे काम नहीं बनने वाला है | समाज के एक – एक व्यक्ति को समाज के विषय में योग्य धारणा होनी चहिये, इसके लिए ही यह प्रयास है |

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