मीराँबाई रा पद

 

तन तलवाराँ तिलछियो, तिन तिल ऊपर सीब।
आलाँ धावाँ ऊठसी, छिन इक ठहर नकीब।।

अर्थात्- इस बीर का शरीर तलवार के धावों से टुकडे-टुकडे हो गया है और तिल तिल पर सिला हुआ है, अतः है चराण! तुम थोड़ी देर के लिए अपनी वीरवाणी बन्द कर लो, अन्यथा यह वीर गीले धावों के रहते हुए ही उठकर रण करने के लिए चल देगा।

आदि
गणपति कृपा करो गुण सागर, जन को जस सुभ गाय सुनाऊँ।
पछिम दिशा प्रसिद्ध धाम सुख, श्री रणछोड़ निवासी।
नरसी को माहेरो मंगल गावे मीरां वासी ।।1।।
क्षत्री वंश जनम मम जानो, नगर बिध इतिहासो।।2।।
सखा आपने संग जु लीन, मन्दिर पे आए।
भक्ति कथा आरम्भी सुन्दर, हरि गुण सीस नवाए ।।3।।
को मंडल को देश बखानू, सन्तन के जस वारी।
को नरसी सो भयौ कौेन विधि, कही महिराज कुँवारी।।4।।
ह्व प्रसन्न मीरां तब भाख्यो, सुन सखी मिथुला नामा।
नरसी की बिध गया सुनाऊँ, सारे सब ही कामा ।।5।।
मध्य-
सोवत ही पलका में मै तो, पग लागी पल में पिऊ आए।
मैं जु उठी प्रभु आदर दैन कूं, जाग परी पिउ ढूंढ न पाए।।
और सखी पिय सोय गमाए, मैं जु सखी पिय जागि गमाए।
आज की बात कहा कहूँ सजनी, सपना में हरि लेत बुलाए।
बस्त एक जब प्रेम की पकरी, आज भए सखि मन के भाए।।
अन्त-
यो माहरौ सुनैरूं गुंनिहै, बाजे अधिक बजाय।
मीरां कहै सत्य करि मानो, भक्ति मुक्ति फल पाय।।

मीरां के पदों में इस सम्प्रदाय का विवेक पूर्वक ग्रहण द्दष्टिगोचर नहीं होता केवल जोगी और जोगिन जैस शब्दों का प्रयोग ही दिखाई देता है-


जोगी मत, मत जा, मत जा, पांड परूं मैं तेरी चेरी हौं।
प्रेम भगति को पैड़ों ही न्यारा, हमकूं गैल बता जा।
अगर चंदण की चिता बणाऊं, अपणे हाथ हला जा।।
जल बल भई भस्म की ढेरी, अपणे अंग लगा जा।
मीरां कहै प्रभु गिरधननागर, जोत में जोत मिला जा।।

इस पद में यदि ये जोगी को जाने से रोकती हैं तो निम्नलिखित पद में कवयित्री स्वयं जोगिन बन जाना चाहती है-

तेरे खातिर जोगण हूंगी, करवत लूँगी कासी।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरण कैवल की दासी।

और उस जोगण का वेष क्या होगा, यह भी मीरां के शब्दो में ही देखिये-
अंग भभूत गले मृग छालां, यों तन भस्म करूं री।
अजहूँ न मिल्या राम अबिनासी, बन बन बीच फिरूँ री।।

कही कहीं जोगण बनने का विचार रखने वाली मीराँ हठयोग-साधन का तिरस्कार करके भाग्य की महत्ता का प्रतिपादन करती है-

तेरो मरम नहिं पायो रे जोगी।
आसण मांडि गुफा में बैठो, ध्यान हरी को लगायौ।।
गल बिच सेली हाथ हाजरियो, अँग भभूति लागयौ।
मीरां के प्रभु हरि अबनासी, भाग लिख्यौ सो ही पायौ।।

1. विधि और निषेध- हृदय की पवित्रता बनाये रखने के लिए कुछ कर्मा का विधान किया जाता है और कुछ का निषेध होता है। उदारत, शील, क्षमा, संतोष धैर्य, दैन्य, दया आदि विधेय कार्य हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णा आदि वर्ज्य कार्य हैं-

राम नाम रस पीजै मनुआं, राम नाम रस पीजै।
तज कुसंग सतसंग बैछ नित, हरि चरचा सुण लीजै।।
काम क्रोध मद लोभ महो कूँ, कहा चित्त से दीजै।।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, ताहि के रंग भीजै।।

2. गुरू की महत्ता- मीरां के अनेक पदों में, सन्त कवियों की भांति गुरू की महत्ता का वर्णन है। जिस प्रकार भगवन्तप्राप्ति के लिए सन्त-कवियों ने गुरू का अस्तित्व स्वीकार किया है, उसी प्रकार मीरां ने भी बताया है कि गुरू की कृपा से ही उसका संशय दूर हुआ तथा रहस्य का रहस्य खुला-

सतगुरू मिलिया सांसा भाग्या, सैन बताई सांची।
ना घर तेरा ना घर मेरा, गावँ मीरां दासी।।

3. राम के प्रति समर्पण- सन्त कवियों ने जिस राम को अपना आराध्य माना है, वह राम-भक्ति वाला राम नहीं, वरन् वह निर्गुण एवं निराकार है तथा दशरथी राम से भिन्न हैं, अपने राम के प्रति समर्पण-भाव प्रदर्शित करते हुए कबीर ने बताया है-

कबीरा कुतिया राम की, मुतिया, मेरा नांउ।
गले राम की जेबड़ी, जित खैचे तित जांउ।।
इसी प्रकार की समर्पण भावना मीरां में मिलती है-
जिहजिह विधि रीझै हरि, सोइ विधि कीजै, हो।
सुन्दर स्याम सुहावणा, मुख देख्या जीजै हो।।

4. अद्वैत भावना- सन्त किव अद्वैतवादी थे, वे आत्मा को परमात्मा का ही अंश मानते थे। उनका विचार था कि जिस प्रकार घट का आवरण होने से जल में रखे हुए घट का जल तथा घट से भरा हुआ जल दोनों भिन्न-भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु घट के फूटने पर दोनों जल एकाकार हो जातै हैं, उसी प्रकार शीर का आवरण समापत् होने पर आत्मा परमात्मा में विलय हो जाता हैं, मरी ा ं ने इस अद्वैत भावना को सूर्य और धाम के माध्यम से व्यक्त किया है-

तुम बिच हम बिच अन्तर नाहीं, जैसे सूर धामा।
मरां के मन अबर न माने, चाहे सुन्दर स्वामी।।

5. निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन- वस्तुत मीरां के मन में अपने आराध्य का कोई निश्चित स्वरूप न था। इनकमे मन पर जैसा भी प्रभाव पड़ा, भावों में जिस प्रकार की हिलोरं उठी, उसी प्रकार से इन्होंने अपने आराध्य का वर्णन कर दिया। यही कारण है कि कहीं तो इनका ब्रह्म कृष्ण-भक्त-कवियों के कृष्ण के रूप में वर्णित है  ौर कहीं वह सन्त-कवियों का निर्गुण ब्रह्म बन जाता है जो सब के वट-घट में व्याप्त है-

जिणरो पियां परदेस बल्यांरी, लिख-लिख भेज्यां पाती।
म्हारां पियां म्हारां हीयड़े बसतां, णा आवाँ णा जाती।।

6. जीवन और संसार की नश्वरता- सन्त कवियों ने जीवनऔर संसार को नश्वर माना है तथा इनके प्रति मोहन न करने के लिए मनुष्य की बार-बार चेतावनी दी है। साथ ही उन्होंने बाह्याडम्बरों का कड़ा विरोध किया है। मीरां के निम्नलिखित पद में भी ये ही प्रवृत्तियां स्पष्ट है-

भज मन चरण केवल अवणासो।
जेतांई दोसां धरण गगन मां, तेताई उठ जासी।।
तीरथ बरतां ग्यांण कथंता, कहा लियां करवता कासी।
यो देही रो गरब णा करणा, माटी में मिल जासी।।
यो संसार चहर रो बाजी, सांझ पड़्यां उठ जासी।
कहा भयां थां भगवा पहरयां घर तज लयां संन्यासी।।

7. दाम्पत्य भाव की भक्ति- सन्त-कवि सामाजिक क्षेत्र में रूखे और कठोर थे। वे बाह्यामडम्बरो का ककंश शब्दो में खड़न करते थे। मा ब्रू यात् सत्यमप्रियम् का नियम उनके सम्मुख बिल्कुल नहीं था; किन्तु भक्ति के क्षेत्र में वे इतने ही मधुर थे। इसलिए उनकी भक्ति मधुर भाव की है। राम उनके लिए प्रियतम हैं और आत्मा प्रियतमा।

1. श्री कृष्ण- वैष्णव कवियों ने कृष्ण को पूर्णब्रह्म तो माना, पर उसकी सगुण रूप में अवतारण की। इसका कारण यह है कि रूप, रेख, गुण, जाति जगति बिन ब्रह्म उन्हें प्रिय न लगा, वह केवल मन को तर्क-वितर्कों में उलझाने वाला था। अतः इन्होने साकर कृष्ण को ही ग्रहण किया  ौर इस पर भी उसके सम्पूर्ण जीवन को न लेकर आंशिक जीवन पर ही अपने काव्य को सीमित रखा। कृष्ण की रूप-माधुरी और रसिकता की उन्हें अधिक आकृष्ट कर सकी। मीरां भी कृष्ण के ये दोनों रूप मिलते है। ये कृष्ण की बाल छवि पर रीझकर गा उठती है-

हो कांनां कित गूँथी जुल्फां कारियां।
सुधर कला प्रवीन हाथन सूं जसुमतिजूँ ने सवारियां।
जो तुम आओ मेरी बाखरियां, जरि राखूँ चन्दन किवारियां।
मीरा के प्रबु गिरनधरनागर, इन जुल्फन पर वारियां।।

बाल-छबि की अपेक्षा मीराँ ने कृष्ण के जीवन का अधिक वर्णन किया है। यौवन के सौन्दर्य के कारण गर्व से भरे उस कृष्ण को देखते ही इनका मन फँस जाता है और यह लोक-लाज को तिलांजलि देकर कह उठती है

– हेरी मा नन्द को गुमानी म्हांरे मनड़े बस्यो।
गहे द्रुम डार कदम को ठाड़ो, मृदु मुसकाय म्हांरी और हँस्यो।
पीताम्बर कट काछनी काछे, रतन जटित माथे मुकट कस्यो।।
मीरां के प्रभु गिरधनरनागर, निरख बदन म्हांरो मनड़ो फँस्यो।।

कृष्ण के इस अपार सौन्दर्य मे कृष्ण-भक्तों को आनन्द का असमी पारावार मिला है। यही इनका रंग-रूप है।

2. द्वैताद्वैत भाव- वैष्ण कवियां ने जीव और ब्रह्म को द्वैत तथा अद्वैत दोनों भावों से ग्रहण किया है। द्वैतभाव के अन्तर्गत विरह वर्णन आता है। यदि यहाँ पर अद्वैत भावना अपना ली जाती तो फिर विरह-वर्णन के लिए स्थान ही नहीं रहता, जो वैष्णव भक्ति-पद्धति की प्रमुखतम विशेषता है। मीरां भी अपने हरि के हाथ बिककर विरह व्यथा से तड़फथी है

अख्यां तरशा दरसण प्यासी।
मग जोवां विण बीतां सजणी, णैण पड्या दुखरासी।
डारा बेठ्या कोयल बोल्या, बोल सुण्या री गासी।।
कड़वा बोल लोक जग बोल्या, करस्यां म्हांरी हांसी।
मीरा हरि रे हाथ बिकाणी, जणम जणम की दासी।।
कहीं-कहीं पर मीरां में अद्वैत भावना भी पाई जाती है। यथा-
म्हांरे आज्यो जी रामां, थारे आवत आल्यां सामां।
तुम मिलायां मैं बोहो सुख पाऊँ, सरै मनोरथ कामा।।
तुम बिच हम बिच अन्तर नाहीं, जैसे सूरज धामा।
मीरां के मन अवर न माने, चाहे सुन्दर स्यामा।।

3. वृन्दावन-सभी वैष्णव कवियों ने वृन्दावन को परमधाम माना है और उसकी मन भरकर प्रशंसा की है। मीरां ने भी इसी परम्परा के अनुसार वृन्दावन की प्रशंसा की है-।

आली म्हांणो लागां, वृन्दावण नीकां।
घर घर तुलीस ठाकर पूरी, दरसण गोविन्द की कां।।
निरमल और ब्रह्मा जमणां मां, भोजन दूध दही कां।
रतन सिंधासण आप बिराज्यां, मुकट धर्यां तुलसी कां।।
कुँजन कुँजन फिर्यां सांवरा, सबद सुण्यां मुरली कां।
मीरां के प्रभु गिरधनरनागर, भजण बिना नर फीकां।।

अब तक हमने वैष्णव-संप्रदाय की दार्शनिकता का संक्षिप्त विवरण दिया है। अब देखना यह है कि इस संप्रदाय की साधना-पद्धति कैसी है और मीराँ की साधना पद्धति से उसमें कितना साम्य एवं वैषम्य है।

1. कृष्ण और राधा-वैष्णव-संप्रदाय में सभी संप्रदाय वालों ने कृष्ण और राधा की पूजा-अर्चना का विधान किया है। यह बात दूसरी है कि किसी संप्रदाय ने कृष्ण को अधिक माना है और किसी ने राधा को। इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि मीरां के आराध्य कृष्ण हैं जिनकी रूपछबि का वर्णन कुछेक पदों में ही मिलता है और वह वर्णन भी स्वतन्त्र रूप में न होकर कृष्ण के साथ ही हुआ है। यथा-

आवत मोरी गलियन में गिरदारी,
मैं तो छुप गई लाज की मारी।
उभी राधा प्यारी अरज करत है, सुणजे किसन मुरारी।
मीरां के प्रभु गिरधनरनागर, चरण कमल पर वारी।।
और कहीं कही राधा का नाम न लेकर केवल संकेत कर दिया है-
होरी खेलत है गिरधारी।
छैल छबीले नवल कान्ह संग, स्यामा प्राण पियारी।
गावत चार घमार राग तहँ, दै दै कल करतारी।।

अब प्रश्न यह उठ सकता है कि मीरां ने राधा का वर्ण इतना कम क्यों किया? इसका कारण यह है कि मीरां ने स्वयं को ही राधा के स्थान पर रख लिया है; अर्थात् राधा भाव से अनुप्राणित होकर अपनी पद-रचना की है, अतः राधा का नाम कम आना स्वाभाविक है। यही मीरां के काव्य की एकान्त विशेषता है।

2. नवधा भक्ति-वैष्णव-भक्ति में नवधा भक्ति की बहुत मान्यता है। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरण-सेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन नवधा भक्ति के भेद हैं। मीराँ के काव्य में ये सभी प्रकार मिल जाते हैं। यह कभी कृष्ण की महिमा का वर्णन सुनाती हैं तो कभी स्वयं उस महिमा का वर्णन करती है। कभी उनके नाम का स्मरण करती हैं तो कभी प्रह्लाद आदि भक्तों का उद्धार करने वाले चरण-कमलों का गुण-गान करती हैं। अपनी दीनता को मीरां ने अपने आराध्य के समुख अनावृत कर दिया है, क्योंकि वह जातनी हैं कि कृष्ण जैसा बगसणहार भी तो कोई दूसरा नहीं है। मीराँ की भक्ति दाम्पत्य भाव की है, इसलिए यह बार-बार अपने आराध्य को स्मरण दिलाती हैं कि यह उनकी जनम-जनम की दासी है।

3. माधुर्य-भाव-कृष्ण भक्तों में माधुर्य भाव की भक्ति का अधिक प्रचलन रहा है। चैतन्य महाप्रभु स्वयं को राधा का रूप मानते थे और हरिदासी संप्रदाय तो सखी संप्रदाय से ही प्रसिद्ध है। यह भक्ति कांता भाव से की जाती है। मीराँ की भक्ति भी इस  ीप्रकार  की है और यह होना स्वाभाविक था। एक नारी इसके अतिरिक्त और किसी भक्ति पद्धति को अपना भी तो नहीं सकती थी। यहाँ पर यह भी उल्लेख है कि ममीराँ के कान्ता भाव में जो स्वाभाविकता है, वह अन्य पुरूष कृष्ण भक्तों में नहीं मिलती, क्योंकि स्वयं नारी होना और नारीत्व का आरोपण करना दोनों में आकाश-पाताल का अन्तर है।

4. अनन्य भाव-कृष्ण भक्तों की भक्ति अनन्य भाव की है; अर्थात् वे कृष्ण को छोड़कर और किसी की स्तुति नहीं करते। सूरदान ने इसी भाव की आभिव्यक्ति करते हुए कहा कि कृष्ण कामधेनु के समान है और अन्य देव छेरी के समान; कृष्ण की भक्ति अम्बुज-रस है, अन्य देवों की भक्ति करीलफल के समान है, इसलिए कृष्ण की भक्ति को छोड़कर अन्य देवों की उपासना करना मूर्खता है-

जिन मधुकर अम्बुज रस चाल्यो, क्यों करील फल खाबै।
सूरदास प्रभु कामधेन तजि, छेरी कौन दुहावै?
मीरां के काव्य में भी यह अनन्य भावना मिलती है-
मीराँ लागो रंग हरी, औरन रंग अँटक परी।

चोरी न करस्याँ जिव न सतास्याँ, कांई म्हांरो कोई।
गज से उत्तर के ख नहिं चढस्याँ, ये तो बात न होई।।

मीरां कृष्ण भक्ति से विमुख होने को हाथी से उतरकर गधे पर चढ़ने के समान मानती है। एक अन्य पद में यह स्पष्ट घोषणा करती हैं कि अनपा कालर और कुष्टी वंर ही भला होता है-

कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज।
खैल विराणो लाख को है, अपणे काज न होइ।।
ताके संगु सीधारतां है, भला न कहसी कोई।
वर हीणों अपणों भला है, कोढी कुष्टी कोई।

1. श्रवण एवं कीर्तन- मीराँ अपने इष्टदेव के गुणों का सदा श्रवण करती रहती हैं। उसकी रूप छवि पर वह लोक-लाज को भी त्याग देती हैं और पग में घुघरूं बाँधकर नाचने लगती हैं

हरि मन्दिर में निरत करास्यां, घुँघरिया धमकास्यां।
राम नाम का झाझ चलास्याँ, भवसागर तर जास्याँ।।

2. स्मरण- कीर्तन के पश्चात् स्मरण की स्थिति आती है। मीराँ अनपे इष्ट देव के स्मरण को संसार के समस्त बन्धनों को तोड़कर, हृदय से लगाये रती हैं  और अपने चित्त पर चढ़ी हुई व उर में अड़ी उस माधुरी मूर्ति के स्मरण में ही सदा व्यस्त रहती हैं-

आली रे मेरे नैनां बाण पड़ी।
चित्त चढ़ीं मेरे माधुरी मूरत, उर बिच आन पड़ी।।

3. चरण सेवन- चरण सेवन के लिए तो मीराँ अपने मन को बार-बार प्रेरित करती है और उसे समझाती है कि जिन चरणओं का सेवन करने से प्रह्लाद काइन्द्र जैसा महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त हुआ, ध्रुव अटल हुए, गौतम-पत्नी का उद्धार हुआ, उन्हीं अगम तारण तरण चरणों का तू भी सेवन कर-

मन रे परिस हरि के चरण।
जिन चरण प्रह्लाद परसे, इन्द्र को पदवी धरण।।
जिन चरण ध्रुव अटल कीने, राखि अपनी सरण।।
जिन चरण प्रभु परसि लीने, तरी गौतम धरण।
दासि मीरां लाल गिरधर अगम तारण तरण।।

4. अर्चन- अपने आराध्य के प्रति अटूट लगाव वैष्णव-भक्तों की प्रमुख विशेषता है। सूरदास स्पष्टता कह देते हैं कि श्रीकृष्ण को छोड़ कर अनय् देव की पूजा रना कामधेनु को छोड़कर छेरी को दोहना है, अथवा परम पवित्र गंगा को छोड़कर अपनी प्यास बुझाने के लिए अलग से कूप खोदना है। मीराँ में भी अपने आराध्य के प्रति यह अनन्य भाव पाया जात है-

नहि हम पूज्यां गोरज्यां जी, नहिं पूजा अनदेव।
परम सनेही गोविन्दो, थे कांई जाना म्हांर भेव।।

5. वन्दन- ऐसे परम स्नेही गोविन्द की ही मीरां अहनिश वन्द करती रहती है। वह उनके चरण-कमलों पर केवल सीर ही नहीं रखतीं, बल्कि पाँयन तक पड़ जाती है।

चोबा चंदन और अगरजा, केसर गागर भरी, धरी री।
मीरां कहे प्रभु गिरधरनागर, चेरी होय पांयन में परी री।।

6. दास्य-वह अपने प्रियतम की दासी है-ऐसी दासी जो बिना मोल के ही उसके हाथों बिक गई है क्योंकि वह उसकी इस जन्म की ही नहीं, बल्कि जन्म-जन्म की दासी है

म्हैं तो जनम-जनम की दासी, थे म्हारा सिरताज।

7. सख्य-भाव-मीराँ के सख्य-भाव की भक्ति भी पर्याप्त मिलती है। कभी वह  ्‌पने साथी के साथ झिरपिट खेलती हैं तो कभी रैणदिना वाके संगि रहती है। इनका तो दावा यहां तक है कि इनका अपने प्रियतम के साथ इसी जन्म का ही नहीं, जन्म जन्मान्तर का साथ है-

राति दिवस मोहि कल न पड़त है, हीयो फटत मेरी छाती।
मीरां के प्रभु कबर मिलोगे, पूरव जनम का साथी।।

8. आत्म-निवेदन- जहाँ तक आत्म-निवेदन की बात है, मीराँ का सम्पूर्ण काव्य ही एक ऐसी आत्मा का करूण निवेदन, है जी अपने प्रियतम को अपना सर्वस्व समर्पित करके भी अखंड विरहिणी बनी हुई है और उस मर्मान्तक विरह के उपचार के लिए वह अनेक प्रयत्न करती है-कभी सुरत निरत का दिवला संझोकर उसने मनसा की बात डालती है, कभी प्रेम हटी से तेल मँगाती है और कभी ज्ञान की पाटी रचकर और अपनी माँग सँवारकर अपनी सूनी सेज पर अपने प्राणप्रिय साँवरे का पथ जोतहती रहती है। कभी वह अपने उद्धार की दुहाई देती है और कभी अपने प्रयितम के उद्धारक गुणों की प्रशंसा करते-करते नहीं थकती। उसके बिना उसे तीनों लोकों में और कही आसरा भी तो नहीं है-

हरि मोरी जीवन प्रान अधार।
और आसिरो नाहिं तुम बिन, तीनूं लोक मंझार।।
आप बिना मोहि कछु न सुहावै, निरख्यो सब संसार।
मीरां कहै में दासी रावरी, दीज्यो मती बिसार।।

इस प्रकार मीरां के काव्य में नवधा भक्ति का सांगोपांग निरूपण हुआ है। किन्तु इसलिए इन्हैं वैष्ण-भक्ति की श्रृंखला में बद्ध करना अनुचित प्रतीत नहीं होता।

मण में परस हरि के चरण ।।टेक।।
सुभग सीतल केवल कोमल, जगत ज्वाला, हरण।
इण चरण प्रहलाद परस्याँ, इन्द्र पदवी धरण।
इण चरण ध्रुव अटल करस्यां, सरण असरण सरण।
इण चरण ब्रह्माण्ड भेट्याँ, नखसिखाँ सिर भरण।
इण चरण कालियाँ नाथ्यां, गोपीलीला करण।
इण चरण गोबरधन धारयाँ गरब मधवा हरण।
दासि मीराँ लाल गिरधर, अगम तारण तरण।।1।।

शब्दार्थ- परस=स्पर्श कर, छू। हरि = श्रीकृष्ण। सुभग = सुन्दर। सीतल = शीतल, दुःख विमोचक। केबल = कमल। ज्वाला = आग। जगत ज्वाला = संसार के विविध ताप, दैहिक, दैविक और भौतिक ताप। दैहिक दुःखो ं के दो भेद हैं (1) शारीरिक रोग, जैसे-खाँसी, ज्वर आदि; मानसिक रोग, जैसे-क्रोध, लोभ आदि। देवताओं अथवा प्राकृतिक शक्तियों के द्वारा दिये जाने वाले  दैविक दुःख कहलातै है, जैसे, आँधी, ओले, भूचाल आदि। स्थावर या जंगम प्राणियों द्रारा प्रदत्त दुःख  भौतिक दुःख कहलातै हैं, जैसे-सर्प-दंश हिंस्र पशुओं के आक्रमण आदि। परस्याँ = स्पर्श करके, छूकर। नखसिखा = नखशिख तक, पूर्णरूप से। सिरी = श्री, शोभा। कालियाँ = कालीं नाग। नाथ्यां = वश मं किया। गरब = गर्व, दंभ। मधवा = इन्द्र। तारण = उतारने में। तरण = तरणि, नौका।पांच तरह रे खाधो सू वणियोडी पंचकुट मारवाड री खासियत हैं। जिणमे सांगरी,खैंर (सुखे मेवे ), कुमाथिया (बील),अमचूर औंर मिर्ची होवे हैं। सब्जियो मे कैंर , सांगरी ,फ़ोग,ककडी, फ़लिया ,टिंडा ,खींपोली ,कंकेडा सब जगा होवे हैं।इरे अलावा मूली, गाजर ,शकरकंद औंर तरबूज भी उगाविजे हैं।

राणा जी! अब न रहूँगी तोरी हटकी ।।टेक।।
साध संग मोहि प्यारा लागै, लाज गई घूँघट दी।
पीहर मेड़ता छोड़ा आपण, सुरस निरत दोऊ चटकी।
सतगुरू मुकुर दिखाया घट का, नाचूँगी दे दे चुटकी।
हार सिंगार सभी ल्यो अपना, चूड़ा कर की पटकी।
मेरा सुहाग अब मोकूँ दरसा, और व जाते घट की।
महल किलां राणा मोंहि न चाहिए, सारी रेशम पट की।
हुई दिवानी मीरां डोलै, केस लटा सब छिटकी।।2।।

शब्दार्थ- हटकी = रोकी हुई। साध = साधु। सुरत-निरत = स्मरण और नृत्य; सन्त-मत की प्रमुख साधना के दो अंग। मुकुर = शीशा। घट = हृदय। पट = कपड़ा।

काहू की मै बरजी नाहीं रहूँ ।।टेक।।
जो कोई मोकूँ एक कहै मैं एक की लाख कहूँ।
सास की जाइ मेरी ननद हठीली, यह दुःख किनसे कहूँ।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, जग उपसाह सहूँ।।3।।

शब्दार्थ-बरजी = रोकने पर भी। जाई = पुत्री। उपहास = मजाक।

रूप देखश अटकी, तेरा रूप देख अटकी  ।।टेक।।
देह तें विदेह मई, ढुरि परि सिर भटकी।
माता-पिता भ्रात बंधु, सब हो मिल अटकी।
हिरदा ते टरत नाहिं मुरति सागर नट की।
प्रगट भयो पूरन नेह लोक जाने भटकी।
मीराँ प्रबु गिरिधर दिन, कौन लहे घटकी।।4।।

शब्दार्थ- बिदेह = देह-विहीन। ढूरि परि = गिर गई। हटकी = रोकी। नागर नट = श्रीकृष्ण। भटकी = भटक गई। लहे = जाने। घटकी = हृदय की।

जब ते मोहि नन्दनन्द दृष्टि पड्यो मांई।
तब से परलोक लोक कछु न सुहाई।
मोहन की चन्द्रकला सीस मुकुट सोहै।
केसर को तिलक भाल तीन लोक मोहै।।
कुण्डल की अलक झलक कपोलन पर छाई।
मानो मीन सरवर तजि मकर मिलन आई।।
कुटिल तिलक भाल चितवन में टोना।
खजन अरू मधुप मीन भूले मृग छोना।।
सुन्दर अति नासिका सुग्रीव तीन रेखा।
नटवर प्रभु वेष धरे रूप अति बिसेखा।।
अधर बिम्ब अरूण नैन मधुर मन्द हाँसी।
दसन दमक दाड़ि द्युति अति चपला सी।।
छुद्र घण्टिका किंकनि अनूप धुन सुहाई।
गिरधर के अंग-अंग मीरा बलि जाई।।5।।

शब्दार्थ-मोहि = मुझको। नन्दनन्दन = कृष्ण। दृष्टि पड्यो =दिखाई दिया। माई = सखी। चन्द्रकला = चाँद जैसी मूर्ति। मीन = मछली। सरवर = तालाब। कुटिल = टेढा। टोना = जादू। मधुग = भौंरा। मृग-छोना = हिरन का बच्चा। नासिका = नाक। सुगीव = सुग्रीवा, सुन्दर गर्दन। बसेखा = विशेष। अधर-बिम्ब = दोनों होंठ। अरूण = लाल। दसन = दशन, दांत। दाड़िम = अनार। द्युति = दुति, ज्योति। चपला = बिजली। छुद्र = छोटी।ष धुनि = ध्वनि

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय ।।टेक।।
रोम रोम नख सिख सब निरखत, ललकि रहै ललचाय।
मैं ठाढी गृह आपणे सै, मोहन निकसे आय।।
बदन चन्द परकातत हेली, मन्द मनद मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजहीं, मानस पर हाथ गये बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मैं सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरधर लाल बिनु, पल भर रह्यौ न जाय।।6।।

शब्दार्थ- बहुरि = फिर। हेली = सखी। सब लई सीस चढ़ाय = शिरोधार्य कर लिया; बिनां किसी नुवता-चीनी के स्वीकार कर लिया।

नन्द को बिहारी म्हाँरे हियड़े बस्यो छै ।।टेक।।
कटि पर लाल काछनी छाले, हीरा मोती-वालो मुकुट धर्यो छै।
गहिर ल्यो डाल कदम्ब की ठाढी, मोहत मो, तन हेरि हँस्यो छै।
मीराँ कै प्रभु गिरधरनागर,निरखि दृगन में नीर भर्यो छै।।7।।

शब्दार्थ- नन्द को बिहारी = श्रीकृष्ण। हियड़े = हृदय में बस्यौ छै बसा हुआ है। कटि कमर पर काछे = बांधे हुए। धर्यो छै = धारण किये हुये है। हेरि = देखकर। निरखि = देखकर। दृगन में = आंखो में।

आण मिल्यो अनुरागी गिरधर आण मिल्यो अनुरागी ।।टेक।।
साँसों सोच अंग नहि अब तो तिस्ना दुबध्या त्यागी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, स्याम बरण बड़ भागी।
जनम जनम के साहिब मेरो, वाही से लौ लागी।
अपण पिया सैग हिलमिल खेलूं अधर सुधारस पागी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, अब के भई सुभागी।।8।।

शब्दार्थ- अनुरागी = प्रेमी। साँसों = संशय, सन्दहे। सोच = शोक। अंग = भाग। तिस्ना = तृष्णा। दुबध्या = द्विविधा। वरण = बरण, वरना, पति-रूप स्वीकार करना। बड़भागी = सौभाग्यदती। साहिब = पति। लौ = लग्न, प्रेम। पागी = छकना। सुभागा = सौभाग्यवाली।

पायी जी मैं तो रामरतन धन पाया ।।टेक।।
वस्तु अमोलक दी म्हाँरे सतगुरू, किरपा करि अपनायो।
जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो।
खरचै नहिं कोई चोर न लेव, दिन-दिन बढ़त सवायो।
सत की नांव खेदिया सतगुरू, भवसागर तर आयो।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, हरख-हरख जस पायो।।9।।

शब्दार्थ- रतन = रत्न। अमोलक = अमूल्य, बहुमूल्य = खोवायो = खो दिया। सत = सत्य। खेवहिया = खेनेवाला। हरख-हरख = हर्ष-हर्ष करके। जस = यश।

माई में तो लियो रमैया मोल ।।टेक।।
कोई कहै छानी, को ी कहै चोरी, लियों है बजता टील।
कोई कहै कारो, को ी कहै गोरो लियो है अखीं खोल।
कोई कहै हल्का, कोई कहै महंगा, लियो है तराजू तोल।
तन का गहना मै सब कुछ दीन्हा, दियो है बाजूबन्द खोल।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, पूरब जनम का कोल।।10।।

शब्दार्थ- रमैया = श्रीकृष्ण। छानी- चिपकर। बजता ढोल-ढोब बजा बजाकर। अखीं = आँखें। पूरब जन्म = पूर्व जन्म। कोल = वचन।

हे माई म्हाँको गिरधरलाल ।।टेक।।
थाँरे चरणाँ की आनि करत हों, और न मणि लाल।
नात सगो परिवारो सारो, मन लागे मानो काल।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, छबि लखि भई निहाल।।11।।

शब्दार्थ- म्हाँको = हमारा। आनि करत हों = पूजा करती हूँ। नात = नहीं तो। काल = मृत्यु। छवि = शोभा। निहाल = प्रसन्न, सफल।

कोई कछु कहो रे रंग लाग्यो, रंग लाक्यो भ्रम भाग्यो ।।टेक।।
लोक कहैं मीराँ भई बाबरी भ्रम दूनी ने खाग्यो।
कोई कहै रंग लाग्यो।
मीराँ साधाँ में यूँ रम बैठी, ज्यूँ गुदड़ी में तागो।
सोने में सुहागो।
मीराँ लूती अपने भवन में, सतगुरू आप जगाग्यो।
ज्ञानी गुरू आप जगाग्योष।।12।।

शब्दार्थ- रंग = प्रेम। भ्रम = अज्ञान। दूनी = दुनिया, संसार । सूती = सोती थी।

अरे राणा पहले क्यों न बरजी, लागी गिरधरिया से प्रती।।टेक।।
मार चाहे छाँड, राणा, नहीं रहूँ मैं बरजी।
सगुन साहिब सुमरताँ रे, में थाँरे कोठे खटकी।
राणा जी भेज्या विष रां प्याला, कर चरणामृत गटकी।
दीनबन्धु साँवरिया है रै, जाणत है घट-घट की।
म्हारे हिरदा माँहि बसी है, लटवन मोर मुकूट की।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, मैं हूँ नागर नट की।।13।।

शब्दार्थ- बरजी = रोक। सगुन = साकार, गुणों का भण्डार। साहिब = कृष्ण। कोठे = मन में। गटकी = एकदम पी गई। घट-घट की = प्रत्येक आदमी के हृदय की।

म्हांरी बात जगत सूं छानी, साधाँ सूं नही छानी री ।।टेक।।
साधू मात-पिता कुल मेरे, साधू निरमल ग्यानी री।
राणा ने समझायो बाई, ऊदां मैं तो एक न मानी री।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, सन्तन हाथ बिकानी री।।14।।

शब्दार्थ- छानि = छिपी हुई। निरमल = निर्मल, पाप से रहित।

अब मीरां मान लीजी म्हांरी, हो जी थांने सखियाँ बरजे सारी ।।टेक।।
राणा बरजे, राणी बरजे, बरजे सब परिवारी।
कुँवर पाटवी सो भी बरजे, और सहेल्यां सारी।
सीसफूल सिर ऊपर सोहै, बिंदली सोभा भारी।
साधन के ढिंग बैठ-बैठ कै, लाज गमाई सारी।
नित प्रति उठि नीच घर जाओ, कुल को लगाओ गारी।
बड़ा धराँ की छोरूं कहावो, नाचो दे दे तारी।
वर पायो हिन्दुवाणे सूरज, इब दिल में काँई धारी।
तार्यो पीहर, सासरों तार्यो, माय मोसाली तारी।
मीराँ ने सद्गुरू मिलिया जी, चरण कमल बलिहारी।।15।।

शब्दार्थ- थाँने = तुमको। बरजे = रोकती हैं। कुँवर पाटवी = सस्भवतः भोजराज। बिंदली = बिन्दी की। साधन के ढिंग = साधुओं के पास। लाज = लज्जा। गमाई = नष्ट कर दी। गारी = कलक। छोरूँ = लकड़ी। हिन्दुवाणए सूरज = हिन्दुओं में सूरज के समान, अत्यन्त पराक्रमी। काँई = क्या।

जावो हरि निरमोहिड़ा, जाणी थाँरी प्रती ।।टेक।।
लगन लगी जब प्रीत और ही, अब कुछ अवली रती।
अम्रित प्याय कै विष क्य दीजै, कूण गाँव की रीथ.
मीराँ कहै प्रभु गिरधरनगर, आप गरज के मीत।।16।।

शब्दार्थ- निरमोहिड़ा = निर्मोही। अवली = दूसरा, उलटा। रीत = ढंग। कूण गाँव की = किस स्थान की। गरज के = स्वार्थ के।

कुबज्या ने जादू डारा री, जिन मोहै स्याम हमारा ।।टेक।।
झरमर झरमर मेहा बरसे, झुक आये बादल कारा।
निरमल जल जमुना को छाँड़ो, जाय पिया जल खारा।
सीतल छाँय कदम की छोड़ी धूप सहा अति भारा।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, वाही प्राण पियारा।।17।।

शब्दार्थ- मोहै = मोहित करना।

साँवरिया, म्हाँरी प्रीतड़ली न्हिभाज्यो ।।टेक।।
प्रीत करो तो स्वामी ऐसी कीज्यो, अधबिच पत छिटकाज्यो।

तुम तो स्वामी गुण रा सागर, म्हाँरा ओगुण चित मति लाज्यो।
काया गढ घेरा ज्यों पड़्या छे, ऊपर आपर खाज्यो।
मीराँ के प्रभु गिरिधरनागर, चित्त रखाज्यो।।18।।

शब्दार्थ- सांवरिया = कृष्ण। प्रीतलड़ली = प्रीत, न्हिभाज्यो = निभाओ। छिटकाज्यो = दूर हटाओ। गुण रा सागर = गुणों के सागर। ओगुण = अवगुण, दोष। चितमति लाज्यो = ध्यान मत दो। काया = शरीर। गढ़ = किला।

को विरहिणी को दुःख जाणै हो ।।टेक।।
जा घट बिरहा सोई लख है, कै कोई हरि जन मानै हो।
रोगी अन्तर वैद बसत है, वैद ही ओखद जाणै हो।
विरह कद उरि अन्दर माँहि, हरि बिन सुख कानै हो।
दुग्धा आरत फिरै दुखारि, सुरत बसी सुत मानै हो।
चात्ग स्वाँति बूंद मन माँहि, पिव-पिव उकातणै हो।
सब जग कूडो कंटक दुनिया, दरध न कोई पिछाणै हो।
मीराँ के पति आप रमैया, दूजा नहिं कोई छाणै हो।।19।।

शब्दार्थ- घट = ह्दय। कैया। हरिजन = हरि-भक्ति। वैद = वैद्य, यहां कृष्ण से तात्पर्य है। औखद = औषधि। करद = क्टार। उर अन्तर आँहि = ह्दय में। दुग्ध = दग्धा पीड़िता। आरत = आरत, दुःख। चातग = चातक। उकलाणै = व्याकुल होना। दरध = दरद, पीड़ा। छाण = रक्षा करना।

पतियाँने कूण पतीजै, आणि खबर हरि लीजै।।टेक।।
झूठी पतियाँ लिख-लिख भेजे, क्या जीजै क्या बीजै।
ऐसा है कोई बाँच सुणावै मैं दाँचू तो भीजै।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी चरण कमल चित दीजै।।20।।

शब्दार्थ- पतियाँ = पत्र। पतीजै = विश्वास करे। बांच सुणावै = पढ़कर सना दे।

गिरधर रूसणुं जी कौन गुनाह।।टेक।।
कछु इक ओगुण काढ़ो म्हाँ छै, म्हें जी कानं सुणा।
मैं दासी थारी जनम जनम की, थे साहिब सुगणाँ।
कांई बात सूं करवौ रूसणऊं, क्यां दुख पावौ छो मना।
किरपा करि मोहि दरसण दीज्यो, बीते दिवस घणाँ।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, थाँरो हो नाँव गणाँ।।21।।

शब्दार्थ- गुनाह = अपराध। ओगुण = दोष। म्हैं भी कानाँ सुणाँ = मैं भी अपने कानों से सुनुं। सुगणाँ = गुण वाले। घणाँ = ज्यादा। नाँव = नाम। गणां = रटा।

थें म्हाँरे घरआवो जी प्रीतम प्यारा ।।टेक।।
चुन चुन कलियाँ मैं सेज बनाऊ, भोजन करूं मैं सारा।
तुम सगुणाँ में अवगुणधारी, तुम छो बगसणहारा।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, तुम बिनि नैण दुखियारा।।22।।

शब्दार्थ- थे = तुम। करूँ = तैयार करूं। सगुणां = गुणवान्‌। अवगुणधारी = दोषों से भरपूर। बगसणहार = क्षमा करने वाला।

में जाणयी नहीं प्रभु को मिलन केसे होय री।।टेक।।
आए मोरे सजना, फिरी गए अंगना, में अभगाण रही सोय री।
फारूँगी चीर, करूँ गलकँथा, रहूँगी वैराग्य होय री।
चूड़ियाँ फोरूँ माँग बिखेरूं, कजरा मैं डारूं घोय री।
निसि बासर मोहिं बिरह सतावै, कल न परत पल मोय री।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, मिलि बिछुड़ी मत कोय री।।23।।

शब्दार्थ- निसि बासर = रात दिन। कल न परत = चैन नहीं पड़ता।

पलक न लागी मेरी स्याम बिना ।।टेक।।
हरि बिनु मथुरा ऐसी लागै, शसि बिन रैन अँधेरी।
पात पात वृन्दावन ढूंढ्यो, कुँज कुँज ब्रज केरी।
ऊँचे खड़े मथुरा नगरी, तले बहै जमना गहरी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर हरि चरणन की चेरी।।24।।

शब्दार्थ- पलक न लागै = नींद नहीं आती। शशि = चन्द्रमा। ब्रज-केरी = ब्रज के। चेरी = दासी।

नींद नहीं आवे जी सारी रात ।।टेक।।
करवट लेकर रोज टटोलूँ, पिया नहीं मेरे साथ।
सगरी रैन मोहै तरफत बीती, सोच सोच जिय जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर आज भयो परभात।।25।।

शब्दार्थ-सगरी = सारी। तरफत = तड़पते हुए। जिय जात = प्राण निकल जाते है। परभात = प्रभात।

दरस बिन दूखण लागे नैनै ।।टेक।।
अब के तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपे, मीठे मीठै बैन।
बिरह-बहिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरां के प्रभु कब रैं मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।।26।।

शब्दार्थ- सबद = शब्द, आहट। विरह-बिथा = विरह-व्यथा। जोबत = देखते देखते। छमासी = छः महीने की, बहुत लम्बी। मेटण = मिटाने वाले। दैढ = देने वाले।

पिया इतनी बिनती सुनो मोरी, कोई कहियो रे जाय ।।टेक।।
और सूं रस बतियाँ करत हो, हम से रहै चित्त चोरी।
तुम बिन मेरे और न कोई, में सरनागत तोरी।
आवन कह गए अजहूँ न आये, दिवस रहे अब थोरी।
मीराँ के प्रभु कब रे मिलोगे, अरज करूँ कर जोरी।।27।।

शब्दार्थ-और सूं = अन्य स्त्रियों से। रस बत्तियाँ = आनन्द से भरी बातें। कर जोरी = हाथ जोड़ कर।

पिया कूँ बता दे मेरे, तेरा गुण  मानूँगी।।टेक।।
खान पान मोहि फीको सो लागै, नैन रहे दोय छाय।
बार बार मैं अरज करत हूँ, रैण दिन जाय।
मीराँ के प्रभु बेग मिलोर रे, तरस तर, जिय जाय।।28।।

शब्दार्थ-फीको = स्वादहीन। नैन रहे होय छाय = दोनों आँखे आसुओं से भरी हुई हैं। तरस-तरस जिय जाय = तड़प-तड़प कर प्राण निकले जाते हैं।

म्हाँरो प्रणाम बाँके बिहारी जी।।टेक।।
मोर मुगट माथ्याँ तिलक बिराज्याँ, कुण्डल अलकांकरी जी।
अधर मधुर घर बंशी बजावाँ, रीझ रिझावाँ नारी जी।
या छब देख्याँ मोह्याँ, मीराँ, महोन गिरधरधारी जी।।29।।

शब्दार्थ-म्हाँरो = हमारा। बाँके बिहारी = रसिक श्रीकृष्ण। मोर-मुगट = मोर-पंखो का ताज। बिराज्याँ = शोभा देता है। अलकाँकारी = काली लटें। अधर = होंठ। रिझावाँ = मोहित करते हैं। छब = छबि, शोभा। मोह्याँ = मोहित हो जाती है। मोहन = मन की मोहने वाले । गिरधारी = श्रीकृष्ण।

वस्याँ म्हारे णेणण माँ नँदलाल ।।टेक।।
मोर मुगट मकराफ्त कुण्डल अरूण तिलक सोहाँ भाल।
मोहण मूरत साँवराँ सूरत णेणा बण्या बिसाल।
अधर सुधारस मुरली राजाँ उर बैजंती माल।
मीराँ प्रबु संताँ सुखदायाँ भक्त बछल गोपाल।।30।।

शब्दार्थ- बस्याँ = बसो। खेणण माँ = नैनों में, आँखों में। मकराकृत = मकर या मछली के आकार का। अरूण = लाल। मोहण = मोहना, मोह लेने वाली। साँवराँ = साँवली। बण्याँ = बने हुए हैं। सुधारस = अमृत के रस के समान। राजाँ = राजती है। सुशोभित होती है। उर = हृदय । बैजन्तीमाल = बैजन्ती माला, जिसे कृष्ण पहना करते थे। सुखदायाँ = सुख देने वाले। भक्त बछल = भक्त-वत्सल। गोपाल = कृष्ण।

हरि म्रा जीवम प्राण अधार ।।टेक।।
और आसिरो णा म्हारा थें बिण, तीनूं लोक मंझार।
थें बिण म्हाणे जग ण सुहावाँ, निरख्याँ पद संसार।
मीराँ रे प्रभु दासी रावली, लीज्यो णेक णिहार।।31।।

शब्दार्थ- हरि = कृष्ण, जीवण = जीवन। अधार = आधार, सहारा। आसरी = ठिकाना। थे बिण = तुम्हारे बिना। निरख्याँ = निरख लिया, देख लिया। णेक णिहार = तनिक देख लो। रावली = आपकी, तुम्हारी।

तनक हरि चितवाँ म्हारी ओर ।।टेक।।
हम जितबाँ थें चितवो णा हरि, हिबड़ो बड़ो कठोर।
म्हारी आसा चितवनि यारी, ओर णा दूजा दोर।
ऊभ्याँ ठाड़ी अरज करूँ छूँ, करताँ करताँ भोर।
मीराँ रे प्रभु हरि अबिनासी, देस्यूँ प्राण अँकोर।।32।।

शब्दार्थ- चितवाँ = देखो। थें = तुम । णा = नहीं। हिवड़ो = हृदय। दोर = दौड़, स्थान । ऊभ्याँ ठाडी = आशा में खड़ी-खडी । भोर = प्रातःकाल। अंकोर = न्यौछावर करना।

ब्रजलीला लख जण सुख पावाँ, ब्रजबणताँ सुखरासी।
णाच्याँ गावाँ ताल बजावाँ, पावाँ आणद हाँसी।
णन्द जसोदा पुन्न रो प्रगटह्याँ, प्रभु अविनासी।
पीताम्बर कट उर बैजणताँ, कर सोहाँ री बाँसी।।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, दरसण दीज्यो दासी।।33।।

शब्दार्थ- गोकल रो = गोकुल का। जण = जन, प्रत्येक व्यक्ति। ब्रजबणताँ = ब्रज-वनिता, ब्रज की नारियाँ। सुखरासी = अपार सुख। णन्द = नन्द, कृष्ण के पिता। कट = कटि। बैजणताँ = बैजयन्ती माला। बाँसी = बाँसुरी। रे = के। नागर = चतुर।

हे मा बड़ी बड़ी अँखियन वारो, साँवरो मो तन हेरत हँसिके।।टेक।।
भौंह कमान वान बाँके लोचन, मारत हियरे कसिके।
जतन करो जन्तर लिखो बाँवा, ओखद लाऊँ घँसिके।
ज्यों तोकों कछु और बिथा हो, नाहिंन मेरो बसिके।
कौन जतन करों मोरी आली, चन्दन लाऊँ घँसिके।
जन्तर मन्तर जादू टोना, माधुरी मूरति बसिके।
साँवरी सूरत आन मिलावो, ठाढी रहूँ में हँसिके।
रेजा रेजा भेयो करेजा, अन्दर देखो घँसिके।
मीराँ तो गिरधर बिन दैखे, कैसे रहे घर बसिके।।34।।

शब्दार्थ-हेरत = देखता है। हियरे हृदय पर । ओखद = औषधि। आली = सखी। रेला-रेजा = टुकड़े-टुकड़े।

हेरी मा नन्द को गुमानी म्हाँरे मनड़े बस्यो।।टेक।।
गहे द्रुमडार कदम को ठाड़ो, मृदु मुसकाय म्हारी ओर हँस्यो।
पीताम्बर कट काछनी, काले रतन जटित माथे मुकुट कस्यो।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, निरख बदन म्हारो मनड़ो फँस्यो।।35।।

शब्दार्थ-गुमानी = गर्वीला, घमंडी। मनड़े = मन में। द्रुम = वृक्ष, पेड़। बदन = मुख।

थारो रूप देख्याँ अटकी।।टेक।।
कुल कुटम्ब सजण सकलस बार बार हटकी।
बिसर्यां णा लगण लगां मोर मुगट नटकी।
म्हाँरो मण मगण स्याम लोक कह्याँ भटकी।
मीराँ प्रभु सरण गह्याँ जाण्या घट घट की।।36।।

शब्दार्थ- थारो = तुम्हारो। देख्यां = देखकर। अटकी = अटक गई, फँस गई। सजणा = लोग। हटकी = भर्त्सना दी, बाधाएँ डालीं। लगण = लग्न, प्रेम। मगण = प्रसन्न। जाण्या = ज्ञाता, जानने वाले। घट-घट की = प्रत्येक मनुष्य के मन की।

निपट बँकट छब अटके।
म्हारे णेणा निपट बंकट छब अँठके।।टेक।।
देख्‌आंय रूप मदन मोहन री, पियत पियूख न मटके।
बारिज भवाँ अलक मँतवारी, णैण रूप रस अँटके।
टेढ्याँ कट टेढ़े करि मुरली, टेढ्याँ पाग लर लटके।
मीराँ प्रभु रे रूप लुभाणी, गिरधरनागर नट के।।37।।

शब्दार्थ- निपट = नितान्त, पूर्ण रूप से। बँकट = वक्र, टेढ़े। छव = छबि, शोभा। पियूख = पीयूष अमृत। न मटके = चलायमान नहीं हुए। बार्रिज = कमल। करि = हाथ। लर = मोतियों लड़, लड़ी।

म्हा मोहणरी रूप लुभाणी।।टेक।।
सुन्दर बदन कमल दल लोचण, बाँका चितवण णेण समाणी।
जमणा किणारे काि न्हे धेनु चरावाँ, बंसी बजावाँ मीठाँ वाणी।
तन मन धन गिरवर पर वाराँ, चरण कँवल मीराँ विलमाणी।।38।।

शब्दार्थ-म्हा = मैं। मोहणरो = कृष्ण के। समाणी = समा गई। विलसाणी = विलीहन हो गई, रम गई।

सांबरो नन्द नन्दन, दीठ पड्याँ माई।
डार्यां सब लोक लाज सुध बुध बिसराई।
मोर चन्द्रका किरीट मुगट जब सोहाई।
केसर रो तिलक भाल लोचन सुखदाई।
कुण्डल झलकाँ कपोल अलकाँ लहराई।
मीणा तज सरवर ज्यों मकर मिलन धाई।
नटवर प्रभु भेष धर्यां रूप जग लोभाई।
गिरधर प्रभु अंग अंग, मरा बलि जाई।।39।।

शब्दार्थ-नन्दनन्दन = कृष्ण। दीठ = दृष्टि। चन्द्रका = पंख। कीरीट = मुकुट। अलकाँ लटें। मीणा = मीन, मछली। सरवर = तालाब। मकर = मगर।

णेणाँ लोभाँ अटकां शवयाँणा फिर आय।।टेक।।
रूँम रूँ नखशिख लख्याँ, ललक ललक अकुलाय।
म्हाँ ठाढ़ी घ आपणै, मोहन निकल्याँ आय।
बदन चन्द परगासताँ, मन्द मन्द मुसकाय।
सकल कुटम्बां बरजतां, बोल्या बोल बनाय।
णेणा चञ्चल, अटक णा माण्या, परहथ गयाँ बिकाय।
भलो कह्याँ कांई कह्याँ बुरोरी सब लया सीस चढ़ाय।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर बिण पर रह्याँ णा जाय।।40।।

शब्दार्थ- णेणाँ = नेत्र। ललक-मलक = बार-बार अभिलाषा करके। अकुलाय = दुखी होते है। म्हाँ = मैं। ठाढ़ी = खड़ी। बदनचन्द = चन्द्रमुख। परगासताँ = प्रकाश करते हुए। बरजताँ = बर्जना करना। बोल्या बोल बनाय = बना-बनाकर बातें करते है; अर्थात् ताने मारते है। अटक = रोक। माण्या = मानते हैं। परहथ = दूसरे के हाथ में, कृष्ण के हाथों में लया सीस चढाय = सहन कर लिया है।

आली री म्हारे णेणा बाण पड़ी।।टेक।।
चित्त चढ़ी म्हारे माधुरी मूरत, हिवड़ा अणी गड़ी।
कब री ठाड़ी पंथ निहाराँ, अपने भवण खड़ी।
अटक्याँ प्राण साँवरो, प्यारो, जीवण मूर जड़ी।
मीराँ गिरधर हाथ बिकाणी, लोग कह्यां बिगड़ी ।।41।।

शब्दार्थ- आली = सखी। बाण = आदत। हिवड़ा = हृदय। अणी  = अनी, नोक। मूर = मूल। हाथ बिकाणी = हाथों में बिक गई, पूर्णतः समर्पित हो गई। बिगड़ी = पथ भ्रष्ट हो गई।

उर में णाख चोर गड़े।
अब कैसेहुँ निकसत निहं ऊधों, तिरछै ह्व जे अड़।
णेणा बणज बसावाँ री, म्हारा साँवरा आवाँ।।टेक।।
णैणा म्हा ौला साँवरा राज्याँ, डरताँ पलक णा लावाँ।
म्हाँरां हिरवाँ बस्ताँ मुरारी, पल पल दरसण पावाँ।
स्याम मिलण सिंगार सजावाँ, सुखरी सेज बिछायाँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर बार सार बलि जावाँ।।42।।

शब्दार्थ- बणज = कमल के समान कोमल। पलक णा लावाँ = पलक न मारना, आँखे खुली ही रखना।

आसा प्रभु जाण, न दीजै हो ।।टेक।।
तन मन धन करि वारणै, हिरदे धरि लीजै, हो।
आव सखी मुख देखिये, नैणां रस पीजै, हो।
जिह जिह विधि रीझै हरि कोई विधि कीजै, हो।
सुन्दर स्याम सुहावणा, देख्यां जीजै हो।
मीराँ के प्रभउ राम जी, बड़ भागण रीझै, हो।।43।।

शब्दार्थ- वारणै = न्यौछावर करना। आव = आपो। जिंह-जिंह = जिस जिस। रीझै = प्रसन्न होना। जीजै = जीवित रहन। बढ़ भागण = बड़ भाग्य से; बड़े भाग्य वाली।

म्हाँ गिरधर आगाँ नाच्याँ री ।।टेक।।
णाच णाच म्हाँ रसिक रिझावाँ, प्रीत पुरांतन जांच्यां री।
स्याम प्रीत री बाँधि घूघर्यां मोहण म्हारो साँच्याँ री।
लोक लाज कुलरा मरज्यादाँ जगमाँ णेकणा राख्याँ री।
प्रीतम पर छब णा बिसरवाँ, मीराँ हरि रँग राच्याँरी ।।44।।

शब्दार्थ- म्हाँ = में। रसिक = कृष्ण। कुलरा = कुलकी। एकण = तनिक भी। राच्यां = रंग जाना।

म्हराँ री गिरधर गोपाल दूसरआं णा कूयाँ।
दूसराँ णाँ कूयाँ साथाँ सकल लोक जूयाँ।।टेक।।
भाया छाँणयाँ, बन्धा छाँड्याँ सगाँ भूयां।
साधाँ ढिग बैछ बैठ, लोक लाज खूयाँ।
भगत देख्यां राजी ह्याँ, लगत देख्यां ख्याँ।
दूध मथ धृत काढ़ लयाँ डार दया छूयाँ।
राणा विषरो प्यालो भेज्याँ, पीय मगण हूयाँ।
मीरां री लगण लग्याँ होणा हो जो हूयाँ।।45।।

शब्दार्थ- कूयाँ = कोई। जूया = देख लिया है। भाया = भाई। सार्धा = साधु। ढिंग = सास। रूया = रोई। दध = दही। छूयाँ = छाछ, सारहीन पदार्थ मगण = प्रसन्न।

माई साँवरे रंग राँची।।टेक।।
साज सिंगार बाँध पग घूंघर, लोकलाज तज नाँची।
गयाँ कुमत लयाँ साधाँ, सँगत, श्याम प्रीत जग साँची।
गायाँ गायाँ हरि गुण निसदिन, काल ब्याल री बाँची।
श्याम बिणआ जग खाराँ लागाँ जगरी बाताँ काँची।
मीरां सिरी गिरधर नट नागर, भगति रसीली जाँची।।46।।

शब्दार्थ- रांची = रंग गई। कुमत = कुबुद्धि, दुर्मति। लयां = लेकर, हण करके। सांची = सच्ची। ब्याल = सर्प। बांची। बच गई। खारा = निस्सार। कांची = कच्ची, नश्वर। रसीली = रसपूर्ण आनंद से भरी हुई। जांची = देखी।

में तो गिरधर के घर जाऊँ।।टेक।।
गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊ।
रैण पड़ै तब ही उछा जाऊँ भोर गये उछि आऊँ।
रैणदिना वाके सँग खेलूं, ज्यूं त्यूं वाहि रिझाऊँ।
जो पहिरावै होई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ।
मेरी उणकी प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ।
जहाँ बैठावैं तितही बैठै, बेचे तो बिक जाऊँ।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, बार बार बलि जाऊँ।।47।।

शब्दार्थ- प्रीतम = प्रियतम। रैण = रात्रि, रात। भोर = प्रातःकाल, सुबह। ज्यूँ त्यूँ = ज्यों-त्यों, हर प्रकार से। होई = सोई।

सखि म्हाँरो लानसियाणओ, देखवाँ कराँरी ।।टेक।।
साँवरो उमरण, साँवरो सुमरण, साँवरो ध्याण धराँ री।
ज्याँ ज्याँ चरण धरणाँ धरती धर, त्याँ त्याँ निरत करारी।
मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर कुंजा गैल फिररी।।47।।

शब्दार्थ- सामरिया = श्यामवर्ण श्रीकृष्ण। निरत = नृत्य, नाँच।

माई री म्हालियाँ गोबिन्दाँ मोल ।।टेक।।
थें कह्याँ छाणो काँ चोड्‌डे, लिया ँ बजन्ता ढोल।
थें कह्यां मुं होधो म्हां सस्तो, लिया री तराजां तोल।
तण वारां म्हां जीवण वारां, वरां अमोलक मोल।
मीरां कूं प्रभु दसरण दीज्यां, पूरब जन्म को कोल।।48।।

शब्दार्थ- म्हा = मैं। थे कह्यां = तुम कहती हो । छाणे = छिपकर । म्हां कां = मैं कहती हूँ। चड्डे = खुले आम। बजन्ता ढोल = ढोल बजाकर अर्थात् प्रकट रूप से। मुहोधो = महँगा। तराजां = तराजू। कोल = वचन।

म्हां गिरधर रंग राती, सैयां म्हां ।।टेक।।
पंचरंग चोला पहर्या सखी म्हां, झिरमिट खेलण जाती।
वां झरमिट मां मिल्यो सांवरो, देख्यां तण मण राती।
जिणरो पिया परदेस बस्यांरी लिख लिख भेज्यां पाती।
म्हारां पियां म्हारे हीयडे लिख लिख भेज्यां पाती।
म्हारा पिया म्हारी हयडे बसतां णा आवां था जाती।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर मग जोवां दिण राती।।49।।

शब्दार्थ-रंग = प्रेम। पंचरंग = पांच (विविध) रंगों का, अर्थात् पांच तत्वों (जल, पृथ्वी, आकाश, वायु, अग्नि) से बना हुआ। चोला = लम्बा और ढोला ढाला कुर्ता. अर्थात् शरीर। झिरमिट = एक प्रकार का खेल। जिसमें सारे शरीर को इस प्रकार से ढक लिया जाता है, कि कोई जल्दी पहचान न सके। अर्थात् कर्मानुसार प्राप्त जीवात्मा की योनि का शरीर रूपी आवरण। राती = अनुरक्त हो गई। मग जोवां = रास्ता देखती रहती हूँ, प्रतीक्षा करती रहती हूँ।

बड़े घैर तालो लागां री, पुरबला पुन्न जगावांरी।।टेक।।
जीलरयां री कामण म्हांरो, डबरां कुण जावांरी।
गंगा जमणा कामणा म्हारो, म्हां जावां दरियावारं ी।
हेल्या हेल्या कामणा म्हारे, पेठ्या मिक सरदारां री।
कामदारां सूं कामण म्हारे, जावा जाव म्हा दरबारां री।
काथ कथीर सूं कामण म्हारे, चढ़स्यां घणरी सार्यांरी।
सोना रूपां सूं काम ण म्हारे, म्हांरे हीरां रो बौपारां री।
भाग हमारो जाग्यां रे, रतणकर म्हारी सीरयां री।
अमृत प्यालो छाड़यां रे, कुण पीवां कडवां नीरा री।
भगत गणां प्रभु परचां पांवां, गजामां जतां दूरबारी।
मीरां रे प्रभु गिरधर नागर, मणरथ करस्यां पूरयारी।।50।।

शब्दार्थ-ताला लागाँ = सम्बन्ध हो गया, लगन लग गई। पुरबला पुन्न = पूर्वजन् का पुन्य। झीलर्यां = झील जलाशय। डांवरा = छोटा तालाब। दरियाव = समुद्र। हेल्या-मेल्या, हेल-मेल दूर का सम्बन्ध। कामदारा = प्रहरी, पहरेदार। काथ = काँच। कबीर = राँग। सारयाँ = लोहा। रूपाँ। सीरयाँ = सम्बन्ध। नीरा = नीर, पानी। बरणथ = मनोरथ, मन की इच्छा।

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